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मातृशक्ति


मातृशक्ति


'ब्रह्मवैवर्त पुराण' (गणपति खंड, अध्याय 40) में आया है कि 'जन्मदाता से भी अन्नदाता पिता श्रेष्ठ है। इनसे भी सौ गुनी श्रेष्ठ और वंदनीया माता है क्योंकि वह गर्भधारण तथा पोषण करती है।'
भगवान श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं-
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
अर्थात् माता तथा मातृभूमि की गरिमा स्वर्ग से भी बड़ी है।
मातृशक्ति की महिमा अपार है। वे माताएँ ही तो थीं, जिन्होंने अपनी उँगली पकड़ाकर जगदाधार को चलना सिखाया ! जगत के पालक को दूध पिलाया और उस परम प्रेमदाता को गले से लगाकर वात्सल्य लुटाया ! कौसल्या जी एक माँ ही थीं, जिन्होंने भगवान राम को जन्म दिया ! यशोदाजी एक माँ ही तो थीं, जिनकी गोद में भगवान कृष्ण खेले ! देवहूति भी एक माँ ही थीं, जिन्होंने भगवान कपिल को बोलना-चलना सिखाया !
माता को शिशु का प्रथम गुरु कहा गया है। माता वह किसान है जो बालक की हृदयरूपी भूमि पर सुसंस्कारों के बीज बोता है। ये ही बीज आगे चलकर विशाल वृक्षों के रूप में परिणत होते हैं। माता सुनीति से सुसंस्कार एवं सत्प्रेरणा पाकर बालक ध्रुव ने अटल पदवी प्राप्त की। दैत्यराज हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधू की भक्तिनिष्ठा के प्रभाव से राक्षस कुल में भी प्रह्लाद जैसे भक्त का जन्म हुआ। मुगलों के अत्याचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी महाराज की महानता के पीछे उनकी माता जीजाबाई के अविस्मरणीय योगदान को कौन भुला सकता है ? अंग्रेजी शासनकाल में नारी जागृति का शंख बजाने वाले विनोबा भावे के संयमी एवं तपस्वी जीवन में उनकी माता का कितना बड़ा योगदान रहा, यह उनके साहित्य में उन्हीं के शब्दों में पढ़ने को मिलता है। ऐसे एक दो नहीं, कई उदाहरण हैं जिनसे मातृशक्ति की महिमा का परिचय मिलता है।

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