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क्या करें, क्या न करें



प्रातः जागरण


सूर्योदय के समय और दिन में सोने से आयु क्षीण होती है। प्रतिदिन सूर्योदय से एक घंटा पहले जागकर मनुष्य धर्म और अर्थ के विषय में विचार करे। सूर्योदय तक कभी न सोये।

सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीना स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।


दंतधावन व दंत-सुरक्षा


मौन रहकर नित्य दंतधावन करे। दंतधावन किये बिना देवपूजा व संध्या न करे।
                                                           (महाभारत, अनुशासन पर्व)

बेर की दातुन करने से स्वर मधुर होता है, गूलर से वाणी शुद्ध होती है, नीम से पायरिया आदि रोग नष्ट होते हैं एवं बबूल की दातुन करने से दाँतों का हिलना बंद हो जाता है।
मंजन कभी भी तर्जनी उँगली (अँगूठे के पास वाली पहली उँगली) से न करें, वरन् मध्यमा (सबसे बड़ी) उँगली से करें। क्योंकि तर्जनी उँगली में एक प्रकार का विद्युत प्रवाह होता है, जिसके दाँतों में प्रविष्ट होने पर उनके शीघ्र कमजोर होने की संभावना रहती है।
महीने में एकाध बार रात्रि को सोने से पूर्व नमक एवं सरसों का तेल मिला के, उससे दाँत मलकर, कुल्ले करके सो जाना चाहिए। ऐसा करने से वृद्धावस्था में भी दाँत मजबूत रहते हैं।
हर हफ्ते तिल का तेल दाँतों पर मलकर तिल के तेल के कुल्ले करने से भी दाँत वृद्धावस्था तक मजबूत रहते हैं। 
रात को नींबू के रस में दातुन के अगले हिस्से को डुबो दें। सुबह उस दातुन से दाँत साफ करें तो मैले दाँत भी चमक जायेंगे।
चबाने का काम मजबूत दाँत ही कर सकते हैं, आँतें नहीं कर सकतें। इसीलिए कहा गया हैः
                    
                   'दाँतों का काम आँतों से नहीं लेना चाहिए।'
अति ठंडा पानी या ठंडे पदार्थ तथा अति गर्म पदार्थ या गर्म पानी के सेवन से दाँतों के रोग होते हैं।
खूब ठंडा पानी या ठंडे पदार्थों के सेवन के तुरंत बाद गर्म पानी या गर्म पदार्थ का सेवन किया जाय अथवा इससे विरूद्ध क्रिया की जाय तो दाँत जल्दी गिरते हैं।
भोजन करने एवं पेय पदार्थ लेने के बाद पानी से कुल्ले करने चाहिए। जूठे मुँह रहने से बुद्धि क्षीण होती है और दाँतों व मसूड़ों में कीटाणु जमा हो जाते हैं।

प्रातःकालीन भ्रमण

प्रातःकाल सैर अवश्य करनी चाहिए। सुबह-सुबह ओस से भीगी घास पर नंगे पैर चलना आँखों के लिए विशेष लाभदायी है।
जो लोग किसी भी प्रकार की कोई कसरत नही कर सकते, उनके लिए टहलने की कसरत बहुत जरूरी है।
टहलना कसरत की सर्वोत्तम पद्धति मानी गयी है क्योंकि कसरत की अन्य पद्धतियों की अपेक्षा टहलने से हृदय पर कम जोर पड़ता है तथा शरीर के एक-दो नहीं बल्कि सभी अंग अत्यंत सरल और स्वाभाविक तरीके से सशक्त हो जाते हैं।

शौच-विज्ञान


सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं है। उषःपान (प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर भ्रमण करने से मलत्याग सरलता से होता।

यदि कब्ज रहता हो तो रात को पानी में भिगोकर रखे मुनक्के सुबह उबालकर उसी पानी में मसल लें। बीज निकाल कर मुनक्के खा लें और बचा हुआ पानी पी लें। अथवा रात्रि भोजन के बाद पानी साथ त्रिफला चूर्ण लेने पर भी कब्ज दूर होता है। साधारणतया सादा, हल्का आहार लेने तथा दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहने से कब्ज मिट जाता है।

सिर व कान ढँक जाये ऐसी गोल टोपी पहनके, मौनपूर्वक बैठकर मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए। इस समय दाँत भींचकर रखने से वे मजबूत बनते हैं।

शौच व लघुशंका के समय मौन रहना चाहिए।

मल-विसर्जन के समय बायें पैर पर दबाव रखें। इस प्रयोग से बवासीर रोग नहीं होता।

पैर के पंजों के बल बैठकर पेशाब करने से मधुमेह की बीमारी नहीं होती।

भोजन के बाद पेशाब करने से पथरी का डर नहीं रहता।




स्नान


स्नान सूर्योदय से पहले ही करना चाहिए।

मालिश के आधे घंटे बाद शरीर को रगड़-रगड़ कर स्नान करें।

स्नान करते समय स्तोत्रपाठ, भगवन्नाम का जप करना चाहिए।

स्नान करते समय पहले सिर पर पानी डालें फिर पूरे शरीर पर, ताकि सिर आदि शरीर के ऊपरी भागों की गर्मी पैरों से निकल जाय।

'गले से नीचे के शारीरिक भाग पर गर्म (गुनगुने) पानी से स्नान करने से शक्ति बढ़ती है, किंतु सिर पर गर्म पानी डालकर स्नान करने से बालों तथा नेत्रशक्ति को हानि पहुँचती है।'
                                                                                          (बृहद वाग्भट, सूत्रस्थानः अ.3)

     स्नान करते समय मुँह में पानी भरकर आँखों को पानी से भरे पात्र में डुबायें एवं उसी में थोड़ी देर पलके झपकायें या पटपटायें अथवा आँखों पर पानी के छींटे मारें। इससे नेत्रज्योति बढ़ती है।

किसी नदी, सरोवर, सागर, कुएँ, बावड़ी आदि में स्नान करते समय जल में ही मल-मूत्र का
विसर्जन नही करना चाहिए।
प्रतिदिन स्नान करने से पूर्व दोनों पैरों के अँगूठों में सरसों का शुद्ध तेल लगाने से वृद्धावस्था तक नेत्रों की ज्योति कमजोर नहीं होती।
स्नान के प्रकारः मन:शुद्धि के लिए-

ब्रह्म स्नानः ब्राह्ममुहूर्त में ब्रह्म-परमात्मा का चिंतन करते हुए।
देव स्नानः सूर्योदय के पूर्व देवनदियों में अथवा उनका स्मरण करते हुए।
समयानुसार स्नानः
ऋषि स्नानः आकाश में तारे दिखते हों तब ब्राह्ममुहूर्त में।
मानव स्नानः सूर्योदय के पूर्व।
दानव स्नानः सूर्योदय के बाद चाय-नाश्ता लेकर 8-9 बजे।
करने योग्य स्नानः ब्रह्म स्नान एवं देव स्नान युक्त ऋषि स्नान।
रात्रि में या संध्या के समय स्नान न करें। ग्रहण के समय रात्रि में भी स्नान कर सकते हैं। स्नान के पश्चात तेल आदि की मालिश न करें। भीगे कपड़े न पहनें।
                                                                 (महाभारत, अनुशासन पर्व)

दौड़कर आने पर, पसीना निकलने पर तथा भोजन के तुरंत पहले तथा बाद में स्नान नहीं करना चाहिए। भोजन के तीन घंटे बाद स्नान कर सकते हैं।
बुखार में एवं अतिसार (बार-बार दस्त लगने की बीमारी) में स्नान नहीं करना चाहिए।
त्वचा की स्वच्छता के लिए साबुन की जगह उबटन का प्रयोग करें।
सबसे सरल व सस्ता उबटनः आधी कटोरी बेसन, एक चम्मच तेल, आधा चम्मच पिसी हल्दी, एक चम्मच दूध और आधा चम्मच गुलाबजल लेकर इन सभी को मिश्रित कर लें। इसमें आवश्यक मात्रा में पानी मिलाकर गाढ़ा लेप बना लें। शरीर को गीला करके साबुन की जगह इस लेप को सारे शरीर पर मलें और स्नान कर लें। शीतकाल में सरसों का तेल और अन्य ऋतुओं में नारियल, मूँगफली या जैतून का तेल उबटन में डालें।
मुलतानी मिट्टी लगाकर स्नान करना भी लाभदायक है।
सप्तधान्य उबटनः सात प्रकार के धान्य (गेहूँ, जौ, चावल, चना, मूँग, उड़द और तिल) समान मात्रा में लेकर पीस लें। सुबह स्नान के समय थोड़ा-सा पानी में घोल लें। शरीर पर थोड़ा पानी डालकर शरीरशुद्धि के बाद घोल को पहले ललाट पर लगायें, फिर थोड़ा सिर पर, कंठ पर, छाती पर, नाभि पर, दोनों भुजाओं पर, जाँघों पर तथा पैरों पर लगाकर स्नान करें। ग्रहदशा खराब हो या चित्त विक्षिप्त रहता हो तो उपर्युक्त मिश्रण से स्नान करने पर बहुत लाभ होता है तथा पुण्य व आरोग्य की प्राप्ति भी होती है।
स्नान करते समय कान में पानी न घुसे इसका ध्यान रखना चाहिए।
स्नान के बाद मोटे तौलिये से पूरे शरीर को खूब रगड़-रगड़ कर पोंछना चाहिए तथा साफ, सूती, धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए। टेरीकॉट, पॉलिएस्टर आदि सिंथेटिक वस्त्र स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं हैं।


भोजन


भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी पीना पुष्टिदायक है और भोजन के एक घंटे के बाद पानी पीना अमृततुल्य माना जाता है। प्रायः भोजन के बीच एक ग्लास (250 मि.ली.) पानी पीना पर्याप्त है।

जब बायाँ नथुना चल रहा हो तो तभी पेय पदार्थ पीने चाहिए। दायाँ स्वर चालू हो उस समय यदि पेय पदार्थ पीना पड़े तो दायाँ नथुना बंद करके बायें नथुने से श्वास लेते हुए ही पीना चाहिए।

साँस का दायाँ स्वर चलता हो तब भोजन और बायें स्वर के चलते समय पेय पदार्थ लेना स्वास्थ्य के लिए हितकर है।

मल-मूत्र त्यागने व रास्ता चलने के बाद तथा स्वाध्याय व भोजन के पहले पैर धो लेने चाहिए। भीगे पैर भोजन तो करे परंतु शयन न करे। भीगे पैर भोजन करने वाला मनुष्य लम्बे समय तक जीवन धारण करता है।
                                                                                                (महाभारत, अनुशासन पर्व)

परोसे हुए अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। मौन होकर एकाग्र चित्त से भोजन करना चाहिए। भोजनकाल में यह अन्न पचेगा या नहीं, इस प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। भोजन के बाद मन-ही-मन अग्नि क ध्यान करना चाहिये| भोजन के अंत में दही नहीं, मट्ठा पीना चाहिए तथा एक हाथ से दाहिने पैरे के अंगूठे पर जल डालें फिर जल से आँख, नाक, कान व नाभि का स्पर्श करें।

पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से क्रमशः दीर्घायु और सत्य की प्राप्ति होती है। भूमि पर बैठकर ही भोजन करे, चलते-फिरते कभी न करे। 
सावधानी के साथ केवल सुबह और शाम को ही भोजन करे, बीच में कुछ भी खाना उचित नहीं है। शाम के समय अल्पाहार करे, दिन में भी उचित मात्रा में सेवन करे। भोजन के समय मौन रहना और आसन पर बैठना उचित है। निषिद्ध पदार्थ न खाये।

भोजन पीना चाहिए और पानी खाना चाहिए। अर्थात् भोजन को इतना चबाओ कि वह पानी जैसा तरल बन जाय। पानी अथवा दूसरा पेय पदार्थ इतना आराम से पीना चाहिए मानो खा रहे हों।

खड़े होकर पानी पीना हानिकारक है, बैठकर और चुस्की लेते हुए पानी पियें।

अंजली से पानी नहीं पीना चाहिए।

स्नान किये बिना, मंत्रजप किये बिना, देवताओं को अर्पण किये बिना, गुरु, माता-पिता, अतिथि तथा अपने आश्रितों को भोजन कराये बिना, अपने से प्रेम न करने वाले व्यक्ति द्वारा बनाया या परोसा गया, उत्तर (या पूर्व) की ओर मुख किये बिना, जूठे मुख से, अपवित्र पात्रों में, अनुचित स्थान पर, असमय, हाथ-पैर-मुँह धोये बिना, बिना इच्छा के या उदास मन से, परोसे गये अन्न की निंदा करते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।


शयन



पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर ही सिर करके सोना चाहिए, इससे जीवनशक्ति का विकास होता है तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है। जबकि उत्तर व पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से जीवनशक्ति का ह्रास होता है व रोग उत्पन्न होते हैं।
हाथ-पैरों को सिकोड़कर, पैरों के पंजों की आँटी (क्रास) करके, सिर के पीछे तथा ऊपर हाथ रखकर व पेट के बल नहीं सोना चाहिए।
सूर्यास्त के दो ढाई घंटे बाद सो जाना व सूर्योदय से दो ढाई घंटे पूर्व उठ जाना उत्तम है।
स्वस्थ रहने के लिए कम-से-कम छः घंटे और अधिक से अधिक साढ़े सात घंटे की नींद करनी चाहिए, इससे कम या ज्यादा नहीं।
जब आप शयन करें तब कमरे की खिड़कियाँ खुली हों और रोशनी न हो।

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