नदी की धार सा 

बहता चला जाता हूं,।

हर्ष में अवसाद में 

तिनका बन जाता हूं।

लहरों की उथल पुथल

 भी सहता हूं,

पर हिचकोले खाते हुए 

उस पार चला जाता हूं।।


@अरुण पांडेय