उस प्रेम पथ का बन पथिक
उस पथ पर मैं चलूं
जहां राग- द्वेष किंचित न हो
सम भाव दृष्टि कर चलूं
जहां प्रेम हो उस एक से
मन का मन से योग हो
शीघ्र मन हो जाय स्थिर
जहां चलती हो सृष्टि प्रेम से
उस प्रेम पथ का बन पथिक
उस पथ पर मैं चलूं
जहां सौदा न होता भावों का
सिर्फ प्रेम ही बस प्रेम हो
मिट जाय मन से दंभ मेरे
क्लेश मिट जाय मेरी राहों का
उस प्रेम पथ का बन पथिक
उस पथ पर मैं चलूं
जहां आनंद ही आंनद हो
आत्मतृप्ति हो सदा
सिर्फ तू रहे और मैं रहूं
चाहूं सदा तेरा संग हो
उस प्रेम पथ का बन पथिक
उस पथ पर मैं चलूं
@अरुण पांडेय
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