स्वप्न में भी सोच नहीं,
सकता हूं कि वो
मुझसे कभी ,
दूर चली जायेगी
जिसको मुझमें सारी,
दुनिया ही दिखती हो
कैसे मुझे वो यूं,
अकेला छोड़ जायेगी
जिसका ही होना केवल,
काफी हो मेरे लिए
क्या उसे कभी भी मेरी,
याद नहीं आयेगी
दिल हूं उसका मैं और,
धड़कन है मेरी वो
फिर कहो कैसे वो,
मुझसे जुदा हो जायेगी
जब - जब मुझको है,
याद करती वो
तब मुझे कैसे नहीं,
उसकी याद सताएगी
न होने से ही उसके डर,
मुझे लगता है
क्या जिंदगी मेरी यूहीं,
आसान रह पायेगी
हर पल ही मांगू दुआ,
अपने मैं रब से
रखना सलामत उसे नहीं तो,
मेरी दुनियां छीन जायेगी
लिखते हुए भी मेरा,
दिल भर आया है
कैसे लिखा है ये ,
मेरी लेखनी बतायेगी
स्वप्न में भी सोच नहीं,
दिल भर आया है
कैसे लिखा है ये ,
मेरी लेखनी बतायेगी
स्वप्न में भी सोच नहीं,
सकता हूं कि वो
मुझसे कभी वो,
दूर चली जाएगी
@अरुण पांडेय
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( मां जब कैंसर से बीमार थी
उस समय उनके स्वास्थ को लेकर मन दुखी रहता था , उस समय की लिखी कविता)


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